Wednesday, December 12, 2018

राजस्थान में 15 विधानसभा सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा पर पड़े

फिलहाल

राजस्थान में 15 विधानसभा सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा पर पड़े

नोटा मतों के इस्तेमाल से भाजपा और कांग्रेस को सात से आठ सीटों का फायदा हुआ है

राजस्थान विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने नोटा का भी काफी इस्तेमाल किया है. यहां 15 विधानसभा क्षेत्र ऐसे रहे जहां विजयी रहे उम्मीदवार के जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा के खाते में पड़े हैं. पीटीआई की खबर के मुताबिक नोटा मतों के इस्तेमाल से भाजपा और कांग्रेस को सात से आठ सीटों का फायदा हुआ है.
एजेंसी के मुताबिक वसुंधरा राजे सरकार के एक कैबिनेट मंत्री और कद्दावर नेता कालीचरण सराफ की जीत के अंतर से अधिक मत नोटा पर पड़े. कालीचरण सराफ ने मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र से 1,704 मतों के अंतर से जीत दर्ज की है, जबकि यहां 2,371 मतदाताओं ने नोटा मतों का उपयोग किया है. आसींद विधानसभा क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार जब्बार सिंह सांखला ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के मनीष मेवाडा को 154 मतों से पराजय किया है. यहां 2,943 मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया है।
पीलीबंगा और मारवाड़ में भी लोगों ने जीत के अंतर के मुकाबले कहीं ज्यादा नोटा का इस्तेमाल किया. रिपोर्ट के मुताबिक पीलीबंगा में भाजपा के धर्मेन्द्र कुमार ने कांग्रेस के विनोद कुमार को मात्र 278 मतों से पराजित किया. यहां 2,441 मतदाताओं ने नोटा दबाया. वहीं, मारवाड़ जंक्शन सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार खुशवीर सिंह ने भाजपा के केसाराम चौधरी को 251 मतों से पराजित किया हैं. इस क्षेत्र के 2,719 मतदाताओं ने नोटा को चुना.
विधानसभा चुनाव में वोटों के रुझान के अनुसार बांसवाड़ा जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नोटा मतों का इस्तेमाल किया गया है. यहां कुशलगढ़ विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 11,002, बागीडोरा में 5,581, घाटोल में 4,857, गरही में 4,594 और बांसवाड़ा में 3,876 नोटा मतों का इस्तेमाल किया गया. इसके अलावा घाटोल, चौहटन, पचपदरा, बूंदी, चौमू, पोकरण, खानपुर, खेतड़ी, मकराना, दांतारामगढ और फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र ऐसे है जहां उम्मीदवार की जीत के अंतर से ज्यादा नोटा का इस्तेमाल किया गया.
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Tuesday, December 11, 2018

सांप्रदायिक दंगों का जिम्मेदार कौन?

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सांप्रदायिक दंगों का जिम्मेदार कौन?

सांप्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है. विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल ज़रूर होता है.

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(जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) के बाद ब्रिटिश सरकार ने सांप्रदायिक दंगों का ख़ूब प्रचार शुरू किया. इसके परिणामस्वरूप 1924 में कोहाट (अब पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत का एक जिला है) में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए. इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक दंगों पर लंबी बहस चली. इन्हें समाप्त करने की ज़रूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किए. इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रांतिकारी आंदोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किए. भगत सिंह का यह लेख जून, 1928 में ‘किरती’ नाम के अख़बार में छपा था.)
भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है. एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं. अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है. यदि इस बात का अभी यक़ीन न हो तो लाहौर के ताज़ा दंगे ही देख लें. किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिंदुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है. यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलां आदमी हिंदू है या सिख है या मुसलमान है. बस किसी व्यक्ति का सिख या हिंदू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफ़ी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था. जब स्थिति ऐसी हो तो हिंदुस्तान का ईश्वर ही मालिक है.
ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान का भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आता है. इन ‘धर्मों’ ने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क़ कर दिया है. और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे. इन दंगों ने संसार की नज़रों में भारत को बदनाम कर दिया है. और हमने देखा है कि इस अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं. कोई बिरला ही हिंदू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठंडा रखता है, बाक़ी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को क़ायम रखने के लिए डंडे लाठियां, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सिर फोड़-फोड़कर मर जाते हैं. बाक़ी कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं. इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेज़ी सरकार का डंडा बरसता है और फिर इनके दिमाग़ का कीड़ा ठिकाने आ जाता है.
यहां तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है. इस समय हिंदुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली. वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मांधता के बहाव में बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो सांप्रदायिक आंदोलन में जा मिले हैं, ज़मीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं. और सांप्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.
दूसरे सज्जन जो सांप्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अख़बार वाले हैं. पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था. आज बहुत ही गंदा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जिनका दिल व दिमाग़ ऐसे दिनों में भी शांत हो.
अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है. यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है. कहां थे वे दिन कि स्वतंत्रता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहां आज यह दिन कि स्वराज एक सपना मात्र बन गया है. बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है. जिसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था, कि आज गई, कल गई, वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मज़बूत कर चुकी है कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है.
यदि इन सांप्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है. असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियां दीं. उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गई थी. असहयोग आंदोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से सांप्रदायिक नेताओं के धंधे चौपट हो गए. विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल ज़रूर होता है. कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धांतों में से यह एक मुख्य सिद्धांत है. इसी सिद्धांत के कारण ही ‘तबलीग’, ‘तनकीम’, ‘शुद्धि’ आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है.
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है. दरअसल, भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी ख़राब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है. भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धांत ताक पर रख देता है. सच है, मरता क्या न करता. लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यंत कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती. इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाए, चैन की सांस नहीं लेना चाहिए.
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है. ग़रीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं. इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए. संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं. तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो. इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी.
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि ज़ार के समय वहां भी ऐसी ही स्थितियां थीं, वहां भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे. लेकिन जिस दिन से वहां श्रमिक-शासन हुआ है, वहां का नक़्शा ही बदल गया है. अब वहां कभी दंगे नहीं हुए. अब वहां सभी को ‘इंसान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं. ज़ार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही ख़राब थी. इसलिए सब दंगे-फ़साद होते थे. लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गई है और उनमें वर्ग-चेतना आ गई है इसलिए अब वहां से कभी किसी दंगे की ख़बर नहीं आती.
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत ख़ुशी की सुनने में आई. वह यह कि वहां दंगों में ट्रेड यूनियन के मज़दूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिंदू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे. यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे. वर्ग-चेतना का यही सुंदर रास्ता है, जो सांप्रदायिक दंगे रोक सकता है.
यह ख़ुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से, जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं. उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नज़र से- हिंदू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन सभी को पहले इंसान समझते हैं, फिर भारतवासी. भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहरा है. भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए. उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं.
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं. न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सबको मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता. इसलिए ग़दर पार्टी जैसे आंदोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फांसियों पर चढ़े और हिंदू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे.
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं. झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुंदर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं. यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.
हमारा ख़्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताए इलाज पर ज़रूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा लेंगे.
(आरोही पब्लिकेशन की ओर से प्रकाशित संकलन ‘इंकलाब जिंदाबाद’ से साभार)

Wednesday, December 5, 2018

शरीर में खून की कमी है? परेशान ना हों, यह रहे उपाय


शरीर में खून की कमी है? परेशान ना हों, यह रहे उपाय

By Tejaram dewasi 
ध्यान दिया जाए तो फिट रहना आसान है और लापरवाही बरती जाए तो बेहद मुश्किल... आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में सही और संतुलित खान-पान ना होने से शरीर को सैंकड़ों बीमारियां जकड़ लेती हैं। इसके बाद शुरू होता है अस्पताल के चक्कर लगाना, तमाम मेडिकल टेस्ट और रुटीन चेकअप कराने का सिलसिला...
शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने का मतलब अनेकों बीमारियों को न्यौता देना है। बता दें, हीमोग्लोबिन एक आयरन युक्त प्रोटीन है। बिना आयरन के शरीर में हीमोग्लोबिन नहीं बन सकता। हीमोग्लोबिन खून को उसका लाल रंग देता है। यह फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंचाता है। अगर शरीर में आयरन की कमी होगी तो हीमोग्लोबिन कम होगा, जिससे शरीर को मिलने वाले ऑक्सीजन में भी कमी होने लगेगी। पुरुषों की मुकाबले महिलाओं में आयरन की कमी ज्यादा देखने को मिलती है। पुरूषों में सामान्य हीमोग्लोबिन 13.5-17.5 ग्राम और महिलाओं में 12.0-15.5 ग्राम प्रति डीएल होना चाहिए। शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी होना एनीमिया कहलाता है।

शरीर में खून की कमी होने के कारण:
1. पोषक तत्वों की कमी
2. आयरन की कमी
3. विटामिन बी-12 की कमी
4. फॉलिक एसिड की कमी
5. स्मोकिंग
6. एजिंग
7. ब्लीडिंग
हीमोग्लोबिन कम होने के लक्षण:
-जल्दी थकान होना
-त्वचा का फीका, पीला दिखना
-आंखों के नीचे काले घेरे होना
-सीने और सिर में दर्द होना
-तलवे और हथेलियों का ठंडा पड़ना
-शरीर में तापमान की कमी होना
-चक्कर और उल्टी आना, घबराहट होना
-पीरियड्स के दौरान अधिक दर्द होना
-सांस फूलना, धड़कनें तेज होना
-अक्सर टांगें हिलाने की आदत
-बालों का अधिक झड़ना
हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए ये खाएं:
अनार
एक अनार हमें सौ बीमारियों से लड़ने की क्षमता देता है। अनार आयरन कैल्शियम, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम और विटामिन से भरपूर होता है। अनार शरीर में खून की कमी को बेहद जल्द पूरा करता है।
चुकंदर
चुकंदर शरीर में खून की मात्रा बढ़ाने का रामबाण इलाज है। चुकंदर का जूस लगातार पीने से खून साफ रहता है और शरीर में खून की कमी भी नहीं होती। चुकंदर में आयरन के तत्‍व अधिक मात्रा में होते हैं, जिससे नया खून जल्दी बनता है।
केला
केले में मौजूद प्रोटीन, आयरन और खनिज शरीर में खून बढ़ाते हैं।
गाजर
लगातार गाजर का जूस पीने या गाजर खाने से शरीर में खून की कमी को पूरा किया जा सकता है।
अमरूद
पका अमरूद खाने से शरीर में हीमोग्लोबीन की कमी नहीं होती।
सेब
अगर आप एनीमिया से ग्रसित हैं तो सेब खाना लाभकारी रहेगा। सेब खाने से शरीर में हीमोग्लोबीन की मात्रा बढ़ती है।
अंगूर
अंगूर में विटामिन, पोटैशियम, कैल्शियम और आयरन भरपूर मात्रा में होता है। अंगूर में ज्यादा आयरन होने से यह शरीर में हीमोग्लोबीन बढ़ाने में सहायक है। अंगूर हमारी त्वचा के लिए भी बहुत फायदेमंद है।
संतरा
संतरा विटामिन-सी के अलावा फॉस्फोरस, कैल्शियम और प्रोटीन का बेहतरीन स्त्रोत है। संतरा खाने से शरीर में ना केवल खून बढ़ता है बल्कि खून साफ भी रहता है।
टमाटर
टमाटर सब्जी ही नहीं, बल्कि एक पौष्टिक और गुणकारी फल है। टमाटर में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस और विटामिन-सी होता है। टमाटर का सूप या टमाटर खाने से शरीर में खून की मात्रा बढ़ती है।

हरी सब्जियां और सलाद
शरीर में आयरन की कमी दूर करने के लिए पालक, सरसों, मेथी, धनिया, पुदीना, बथुआ, ब्रोकली, गोभी, बीन्स, खीरा खूब खाएं। शरीर में हीमोग्लोबीन बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियां भोजन में शामिल करें। पालक के पत्तों में सबसे अधिक आयरन पाया जाता है।
सूखे मेवे
हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए खजूर, बादाम और किशमिश खाएं। इनमें आयरन की पर्याप्त मात्रा होती है। रोजाना दूध के साथ खजूर खाने से शरीर को बहुत-से फायदे होते हैं। खजूर खाने से शरीर को भरपूर मात्रा में आयरन मिलता है।
गुड़
गुड़ एक प्राकृतिक खनिज है जो आयरन का प्रमुख स्रोत है। यह विटामिन से भरपूर होता है। गुड़ शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाने में मदद करता है। लगातार गुड़ खाने से पेट की समस्‍याओं से भी निजात पायी जा सकती है।
इसके अलावा शरीर में आयरन और विटामिन बी-12 की कमी को पूरा करने के लिए मीट, चिकन, मछली, अंडे का भी सेवन कर सकते हैं। बता दें, अंडे के पीले भाग में भरपूर मात्रा में विटामिन बी-12 पाया जाता है।
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कलियुग मे लंका सेतु निर्माण

 कलियुग मे लंका सेतु निर्माण



साथियों, पेश है, लगभग तीन साल पहले लिखा हुआ मेरे एक लेख का रीठेल। यह एक काल्पनिक लेख है, इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नही है। इसलिए इसको सिर्फ़ मनोरंजन की दृष्टिकोण से ही पढा जाए।
सबसे पहले तो एक डिसक्लेमर: यह एक काल्पनिक लेख है, इसका उद्देश्य लोगों को हँसाना है, ना कि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना। इसलिये कोई चप्पल जूता लेकर हमारे द्वारे ना आये। और एक आवश्यक सूचना यदि इस डिसक्लेमर के बावजूद आप आवेश मे आकर अपने चप्पल हमारी तरफ़ फ़ेंक कर मारे तो कृप्या करके दोनो पैरो की चप्पले फ़ेंके, अन्यथा एक चप्पल हमारे किसी काम की नही, उसे वापस आपकी तरफ़ उछाल दिया जायेगा।
अभी कुछ दिनो पहले मेरे को किसी ने एक मेल फ़ारवर्ड की थी, जिसमे भगवान श्रीराम द्वारा,त्रेता युग मे लंका पर चढाई के लिये रामेश्वरम से श्रीलंका तक बनाये गये पुल की सैटेलाइट इमेज के चित्र थे, बाद मे पता चला किसी रामभक्त ने बहुत जतन से उन चित्रों को असली रूप देने की कोशिश की थी। ताकि रामायण की सत्यता सिद्द की जा सके। अब मै यहाँ पर उन चित्रों की सत्यता और असत्यता सिद्द करने नही बैठा हूँ बल्कि मै तो बस ये अन्दाजा लगा रहा था कि यदि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने वो पुल त्रेता युग की जगह कलियुग मे बनाया होता तो क्या नजारा होता। जरा आप भी देख लीजिये, तो जनाब पेश है, किस्सा ए लंका सेतु।


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राम बड़े हैरान परेशान से इधर उधर टहल रहे थे, समुन्द्र देवता भी कुछ कोआपरेट नही कर रहे थे, लक्ष्मण ने भाई को चिन्तावस्था मे देखा तो पूछा “ऐसा क्या मसला है बिग ब्रदर, व्हाई आर यू सो टेन्सड?” राम ने दु:खी अवस्था मे कहा ” ये समुन्दर देव हमारी बात सुन ही नही रहे, लगता है इनको कुछ डोज देना ही पड़ेगा।” इतना कहकर उन्होने अपने हाई टेक धनुष बाण को उठाया और गाइडेड तीर को समुन्दर की तरफ़ तान दिया। समुन्दर पानी पानी से धुंआ धुंआ हो गया, बहुत विचलित हो गया, उसने भी सुन रखा था, यदि बाण, धनुष से निकल गया तो फ़िर कुछ नही किया जा सकता, इसलिये मान्ड्वली करने मे ही भलाई है। लेकिन क्या करे, एक तरफ़ रावण (सो काल्ड भाई॒!) और दूसरी तरफ़ कल के लड़के।इधर कुंआ और उधर खाई, पिटाई तो दोनो तरफ़ से ही होनी थी, लेकिन फ़िर भी समुन्दर ने बीच का रास्ता निकालते हुए राम को पुल बनाने का सुझाव दिया। ये सुझाव हजार बवालों की जड़ थी, मुझे आज तक समझ मे नही आया, पुल बनाने के सुझाव को क्यों एक्सेप्ट कर लिया गया।बीच से समुन्दर को सुखाकर अपने आप रास्ता बनाने का सुझाव तुलसीदास को क्यों नही आया। राम को पुल बनाने मे ट्रेप तो दिखा, लेकिन फ़िर भी मौके की नजाकत को देखते हुए एग्री कर गये। क्योंकि गाइडेड मिसाइल भी लार्ज प्रोडक्शन मे नही थी, सब यंही खतम करते तो रावण पर क्या बरसाते।अब परेशानी थी, आर्किटेक्ट की, नल और नील (क्या कहा, नील एन्ड निकी, अमां नही यार, वो तो बिस्तर से बाहर ही नही निकले !,पिक्चर आयी भी और गयी भी गयी, देख नही सके, सिर्फ़ पोस्टर से ही सन्तोष करना पड़ा।चलो ज़ी सिनेमा या किसी टीवी चैनल पर अगले महीने देख लेंगे) आगे बढकर, राम को कन्वीन्स कर दिए कि हम पुल बना लेंगे। लेकिन बोले कि मसला गम्भीर है इसलिये अलग अलग सरकारी विभागों से नो आब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट लेना पड़ेगा।
राम ने सोचा, एक पंगे से बाहर निकले और दूसरा सामने खड़ा हो गया। जब दुनिया भर में सेतु बनने की बात फ़ैली तो सबसे पहले ग्रीनपीस वाले आये (अक्सर यही लोग सबसे पहले पिलते हैं, तू कौन खांम खा तरीके से) वो अपनी बोट लेकर रामेश्वरम कि किनारे कैम्पिंग कर दिये, बोले हम इस पुल के निर्माण प्रोसेस का अध्ययन करेंगे और इन्श्योर करेंगे कि इससे पर्यावरण पर कोई खतरा तो नही है। राम की सेना को उनका खर्चा भी उठाना पड़ गया। अभी इस पंगे से बाहर निकले ही थे, तो मछुवारों का एक एनजीओ (जिनकी एक मल्टीनेशनल फ़िशिंग कम्पनी से सैटिंग और बैकिंग थी) सामने आया और बोला कि पुल नही बनना चाहिये, नही तो समुन्दर के इस हिस्से में मछलियों का अकाल पड़ जायेगा। इसलिये हम पुल के बनाने का विरोध करते है, फ़िर वही रोजाना धरना प्रदर्शन। अब रामजी भी बहुत सोचे, चार दिन तो समुन्दर देव खा गया, एक हफ़्ता ये लोग खा जायेंगे, फ़िर जामवन्त ने भी चुपके से बताया, कि रोजाना रात को ग्रीनपीस और एनजीओ वाले १०,००० की तो दारू पी जाते है, पाँच दिन का कुल मिलाकर पचास हजार तो हो ही चुका है,वो भी सब हमारे खाते में, इसलिये निगोशियेशन करके कोई आउट आफ़ कोर्ट सैटिलमेन्ट कर लो, कोर्ट कचहरी मे तो बहुत दिक्कत हो जायेगी यहाँ रामेश्वरम तो सेशन कोर्ट भी नही है, बहुत दूर जाना पड़ेगा। और तमिलनाडु के कोर्ट मे मामला भी बहुत लम्बा खिंचता है शंकराचार्य को ही लो।अभी तक पंगे से बाहर नही निकल सके हैं। आखिरकार रामजी को भी हथियार डालने पड़े और फ़िशिंग कम्पनी को १० साल के एक्सक्लुसिव फ़िशिंग राइटस का आश्वासन देने के बाद ही एनजीओ ने धरना प्रदर्शन बन्द किया। लेकिन फ़िर भी ये तय हुआ कि एनजीओ वाले पुल के बनने तक यहीं डेरा डाले रहेंगे,क्यों? अमां फ़्री की दारू और कहाँ मिलती?
अब मसला था, मन्त्रालयों से एनओसी लेने का। ये काम सौंपा गया लक्ष्मण को।वो हनुमान के कन्धे पर बैठ्कर दिल्ली चले गये।दिल्ली में पर्यावरण मन्त्रालय के सैक्रेटरी शुकुल बाबू फ़ाइल पर कुन्डली मारकर बैठ गये, बोले ये पुल तो पर्यावरण को नुकसान पहुँचायेगा फ़िर इत्ता बड़ा प्रोजेक्ट बिना फ़िजिबिलिटी स्टडी किये तो करा नही सकते। लगे हाथों अपने साले की सिविल कन्सल्टिंग कम्पनी का कार्ड थमाये और बोले जब तक फ़िजिबिलिटी स्टडी नही होती तब तक फ़ाइल आगे नही बढेगी। मरता क्या ना करता, लक्ष्मण ने कन्सल्टिंग कम्पनी को भी हायर कर लिया। अब कन्सलटेन्ट ने लम्बी चौड़ी फ़ीस और साले ने अपने जीजा का अच्छा खासा कट लेने के बाद सवालों की झड़ी लगा दी। विदेश मंत्रालय वाले पुत्तु स्वामी से पहले से ही शुकुल ने सैटिंग कर रखी थी। इसलिये सजेस्ट किया गया कि सबसे पहले तो विदेश मंत्रालय से एप्रोवल लिया जाय, क्योंकि पुल अन्तर्राष्ट्रीय सीमा मे बनेगा। उधर लंका की सरकार को पता चला तो उन्होने भी यूएन को प्रोटेस्ट दर्ज करवा दिया बोले कि ये पुल तो बहाना है, भारत अपने पड़ोसी मुल्क के शान्त माहौल को बिगाड़ना चाहता है। उधर राम की समस्यायें बढती जा रही थी, एक के बाद एक नये पंगे सामने आते जा रहे थे।इधर एक मिनिस्ट्री से एप्रुवल मिलता तो दूसरी मिनिस्ट्री टांग अड़ा देती, किसी तरह से सभी मिनिस्ट्री से एप्रोवल प्राप्त किया गया तो एक मनचले ने चिन्चपोकली मे जनहित याचिका दायर कर दी, और कहा कि राम की सेना के पास तो क्वालीफ़ाइड आर्किटेक्ट ही नही है, नल और नील ने तो किसी यूनिवर्सिटी से डिग्री नही ली, पता नही किसी किश्किन्धा यूनिवर्सिटी से पार्ट टाइम, करैस्पोन्डेन्स कोर्स किया है। इसलिये इतने बड़े पुल का काम दो नौसिखियों के हाथ मे नही दिया जा सकता। अब रामजी फ़िर से परेशान हैं।
आखिरी समाचार मिलने तक, राम की सेना रामेश्वरम मे डेरा डाले हए है, एनजीओ दारु पर दारु पिये जा रहे हैं, फ़िशिंग कम्पनी मछलियां पकड़े जा रही है, लंका सरकार ने सुरक्षा परिषद मे गुहार लगाई हुई है, अमरीका वाले आये दिन श्रीलंका और भारत का दौरा किये जा रहे हैं। दोनो जगह अलग अलग बयानबाजी कर रहे हैं।शुकुल ने लक्ष्मन से मिले माल से अपने बेटे को सिविल(पुल डिजाइन) मे डिप्लोमा करवाना शुरु करवा दिया है, इस आशा मे जब तक पुल का निर्माण शुरु होगा, तब तक तो बेटा डिप्लोमा कर ही लेगा, तब कंही ना कंही फ़िट करवा देंगे। विदेश मंत्रालय वाले पुत्तु स्वामी माल हजम कर गये, क्योंकि मन्त्री जी बदल गये, अब नया मन्त्री तो नया सेक्रेटरी, तो फ़िर से माल पानी पहुँचाना पड़ेगा।जनहित याचिका वाले मनचले को और कुछ नही राम एन्ड पार्टी को करीब से देखना था, इसलिये तारीख पर तारीख पड़वा रहा था, मामला अभी तक अदालत मे लम्बित है, और राम एन्ड पार्टी रामेश्वरम चिन्चपोकली के बीच शटलिंग कर रही है। और राम की समझ मे नही आ रहा कि पुल बने तो कैसे।


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व्यंग्य: राजनीतिक दलों के तनाव का रामबाण नुस्खा

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व्यंग्य: राजनीतिक दलों के तनाव का रामबाण नुस्खा

  • By Tejaram dewasi

Image copyrightBBCकीर्तीश भट्ट, बीबीसी कार्टून

मेडिकल साइंस ने भले ही कितनी तरक्की कर ली हो उसके पास उन रहस्यमयी और शिथिल कर देने वाले मर्ज़ का इलाज नहीं है, जिसने भारत की सियासी पार्टियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है.
राजधानी दिल्ली में अगर कोई ऐसा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल होता जहां क़यास के आधार पर मर्ज की जांच-परख हो पाती तो वहां के मरीज़ों की फिहरिस्त कुछ इस तरह की होती

कांग्रेस


Image copyrightBBCबीबीसी कार्टून

132 साल पुरानी पार्टी की बीमारी कुछ इस तेज़ी से बढ़ रही है कि उसकी स्थिति को रडरलेस ड्रिफ्ट सिंड्रोम कह सकते हैं, यानी, एक ऐसी नाव जो बिना पतवार के बह रही हो.
ये बीमारी की वो किस्म है जिसमें कमांड और कंट्रोल, दोनों ताक़तें कमज़ोर हो जाती हैं. नतीजा लुंज-पुंज होता पार्टी संगठन.
वैसे कांग्रेस के हालात बदल भी सकते हैं, गाड़ी पटरी पर फिर से आ सकती है. लेकिन इलाज 'हाईकमान के स्तर' पर ही होना चाहिए और उसके बाद भी संगठन को तीमारदारी की जरूरत बनी रहेगी.
कांग्रेस जिस बीमारी से जूझ रही है उसके मरीजों के सामने अक्सर पहचान का संकट भी खड़ा हो जाता है. आधार कार्ड या पहचान बताने वाला कोई दूसरा पुर्जा इसका इलाज नहीं हो सकता.
आराम और विश्राम, मक्खन लगाने का कोई आयुर्वेदिक या गैर आयुर्वेदिक तरीका, आरोप-प्रत्यारोप, यकीन दिलाने की कोशिशों से मदद नहीं मिलने वाली.
और न ही दूसरों को प्रभावित करने के काम आने वालीं डेल कार्नेगी जैसे लेखकों की किताबें. और इस मामले में तो सही सिग्नल देना सीखने के लिए किसी ट्रैफिक पुलिस के अंदर की गई इंटर्नशिप भी कारगर नहीं होने वाली है.
किसी और चीज से कहीं ज्यादा इस मरीज को पॉलिटिकल प्लेटलेट्स वाला खून चढ़ाने की जरूरत है ताकि मोदी के डर का भूत भाग सके और इरादों का संचार हो सके.
दरअसल कांग्रेस को भरोसा बढ़ाने के लिए बूस्टर डोज़ की सख्त जरूरत है जिससे पार्टी सियासी तौर पर समझदार लगे.
आगे की लड़ाइयों में अस्तित्व का संघर्ष होना है और इससे जूझने के लिए पार्टी को अपने चाणक्यों के साथ अक्सर मिल-बैठकर सोच विचार करना होगा. शायद इससे मदद मिले.

Image copyrightBBCकीर्तीश भट्ट, बीबीसी कार्टून

समाजवादी पार्टी


Image copyrightBBCकीर्तीश भट्ट, बीबीसी कार्टून

बायपोलर डिसऑर्डर यानी पल में माशा, पल में तोला की तरह बदलने वाला बाप-बेटे का झगड़ा समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी बीमारी है.
इससे पहले कि ये नासूर बन कर लाइलाज हो जाए, पार्टी को इसे सुलझाना होगा.
परिवार के लोग मिल-बैठकर इसे सुलझा लें, यही इलाज है. परिवार के लोगों का ख्याल और मिज़ाज इस कदर एक दूसरे से जुदा है कि उनके एक हो जाने से चीजें बेहतर होने वाली नहीं हैं.
आपराधिक तत्वों के खिलाफ हाल ही में विकसित किया गया टीका मददगार हो सकता है. हालांकि अभी तक इसका ट्रायल भी नहीं हुआ है.
अलग-अलग सुरों में बोलने की बीमारी का ऑपरेशन वो इलाज है जिसे बिना किसी शक सुबहे के अपनाया जा सकता है.
कांग्रेस को जो पॉलिटिकल प्लेटलेट्स चढ़ाने का परचा लिखा गया था, वो सपा को भी मदद कर सकता है.
मरीज को जातिवादी राजनीति से ऊपर उठने की जरूरत है. उन्हें ये सोचना चाहिए कि बंटे हुए समाज को वे सियासी तौर पर कैसे जोड़ेंगे.
इत्तेफाक से ये एक ऐसी बीमारी है जो मायावती की बहुजन समाज पार्टी को भी है. मायावती से दोस्ती भरोसा बहाल करने का बड़ा कदम हो सकता है.
नर्सरी के बच्चों की तरह ये कविता पाठ भी मदद कर सकता है, "पार्टी छोटी या बड़ी... सब को लोकतंत्र की देवी ने बनाया है..."

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आम आदमी पार्टी


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पंजाब और गोवा में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अजीब सा रोग लग गया है.
ये एटिसिफोबिया या नाकामी से डर की बीमारी है. इसके लक्षण हैं, जबरदस्त बेचैनी और तकलीफ.
इसके मरीज को अक्सर ये लगता है कि हर कोई उसके खिलाफ साजिश रच रहा है और खतरा किसी भी लम्हा उसके सामने बिन बुलाये मेहमान की तरह आ सकता है.
दिल्ली नगर निगम चुनावों से ठीक पहले इस खबर से कि बीजेपी आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से ज्यादा भ्रष्ट समझती है, पार्टी का रोग बढ़ा दिया है.
नाकामी के डर से जूझ रहे मरीजों को अक्सर उस हालात का सामना करना पड़ता है जिसे 'मति भ्रम' कहते हैं और सदमे की सूरत में पेशेंट को ये समझ में नहीं आता है कि क्या करें, क्या न करें.
मरीज को ये लगता कि उसके फायदा से दुश्मन (भाजपा) का नफा हो जाएगा.
ये लक्षण तब और स्पष्ट हो गए जब आम आदमी पार्टी कांग्रेस और भगवा ताकतों के खिलाफ चुनावी मैदान में उतर गई और फिर इस ख्याल से सहम गई कि उसने बीजेपी को जीत थाली में सजाकर दे दी है.
समझा-बुझाकर किसी को रास्ते पर लाना वो नुस्खा है जो ऐसे मरीजों को बताया जाता है जो समझने के लिए तैयार हों और जो खुद डॉक्टर बनकर दूसरों का इलाज करने की कोशिश नहीं करता हो.
दोस्त से दुश्मन बने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोगों से फिर से रिश्ता जोड़कर भरोसा और साख दोनों बहाल किया जा सकता है.

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शिव सेना, बीजेडी, अन्नाद्रमुक

ये सभी पार्टियां एक गंभीर रोग का शिकार हैं. इसे पहचान का संकट कहते हैं.
सत्ता विरोधी रुझान और बीजेपी नाम की ग्रंथि से पीड़ित इन पार्टियों को इलाज की दरकार है.
पुराने दोस्त बीजेपी से ठुकराये जाने की जिल्लत से शिवसेना को उबरने की जरूरत है.
ऐसे मरीजों को इलाज के तौर पर ये सलाह दी जाती है कि वे खारिज किए जाने को ज्यादा दिल पर न लें.
ओडिशा में नवीन पटनायक को सत्ता विरोधी लहर और भगवा ताकतों द्वारा निगल लिए जाने का डर सता रहा है.
जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक भी कांग्रेस की तरह ही रडरलेस ड्रिफ्ट सिंड्रोम से पीड़ित है.

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भारतीय जनता पार्टी

ऐसा नहीं है कि सारी बीमारियां केवल विपक्षी पार्टियों को ही हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी भी बीमार दिखती है. वह फिलहाल ह्यूब्रिस सिंड्रोम का शिकार है. यह एक तरह का व्यक्तित्व दोष है जिसमें सत्ता में बैठे व्यक्ति को ये लगता है कि उसे जबरदस्त समर्थन हासिल है और उसे कोई भी कुछ भी करने से रोक नहीं सकता है.
इसकी वजह से बीजेपी को ये लगा कि उसके पास लोकप्रिय जनादेश का लाइसेंस है. वो चाहे तो हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने से लेकर अर्थव्यवस्था को मनमाने तरीके से चला सकती है.
लगातार चुनावी जीत हासिल करने के बाद ह्यूब्रिस सिंड्रोम के मरीजों में तानाशाही प्रवृतियां पल्लिवत हो जाती हैं. और इसके बाद वो बेतुक फैसले जल्दबाजी में लेने लगता है और आलोचना या मशविरों को लेकर उसकी नाफरमानी बढ़ जाती है.
ह्यूब्रिस सिंड्रोम का क्या कोई इलाज है? साल 2009 में राजनेता रह चुके मनोवैज्ञानिक डेविड ओवेन ने जोनाथन डेविडसन के साथ ह्यूब्रिस सिंड्रोम पर एक पेपर लिखा.
जोनाथन डेविडसन नॉर्थ कैरोलिना के ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के मनोवैज्ञानिक हैं. रिसर्च पेपर में डेविड ओवन ने उम्मीद जताई कि आने वाले कल में मेडिसिन से इसके इलाज का जरिया खोजा जा सकेगा. लेकिन उन्होंने ह्यूब्रिस सिंड्रोम के खतरों को लेकर भी आगाह किया.
उन्होंने कहा, "क्योंकि सत्ता के नशे में चूर एक राजनेता कई लोगों की जिंदगी पर बुरा असर डाल सकता है. इसलिए ऐसे विचारों का माहौल बनाने की जरूरत है जिसमें नेताओं को अपनी कारगुजारियों को लेकर ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए."

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निराशा के भंवर में फंसे विपक्ष को मजबूत करके और सवाल पूछने वाली मीडिया को बढ़ावा देना ही इस बीमारी का एकमात्र इलाज है. मीडिया को साइकोफैंट सिंड्रोम यानी खुशामद करने वाली आदत से बचना होगा.
लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या सर्वशक्तिमान मरीज ऐसे इलाजों को आजमाने की इजाजत देगा. हाल के दिनों में राजनेता खुद को मसीहा समझने लगे हैं कि उन्होंने सबको बचाने का ठेका ले रखा है. मुमकिन है कि जनता से ठुकराये जाने पर ही इस तरह के नेता और पार्टी बच जाए.

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(वामपंथी दलों को कुछ साल पहले इंटेसिव केयर यूनिट में देखा गया था. उन्हें लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है क्योंकि वे अस्पताल में इलाज कराये जाने पर यकीन नहीं करते हैं. उन्हें क्रांतिकारी इलाज चाहिए.)
(अतुल्य अभिनव भारत हिन्दी के व्य‌ंग्यात्मक लेख लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें गूगल प्लस और  पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

अंधविश्‍वासी समाज

             भारत हमेशा से अंधविश्‍वासी लोगों की भूमि रही है। हर धर्म, हर संस्‍कृति और समुदाय में लोगों ने अलग-अलग अंधविश्‍वासों को जगह द...