Monday, August 6, 2018

अंधविश्‍वासी समाज

             भारत हमेशा से अंधविश्‍वासी लोगों की भूमि रही है। हर धर्म, हर संस्‍कृति और समुदाय में लोगों ने अलग-अलग अंधविश्‍वासों को जगह दे रखी है। कुछ अंधविश्‍वासों को वैज्ञानिक कारणों से जोड़कर निभाया जाता है और कुछ को पुराने रीति-रिवाज मानकर। लेकिन इन सभी मूर्खतापूर्ण अंधविश्‍वासों को लोग बड़ी श्रद्धा से निभाते है   देश में आधुनिकीकरण हो चुका है और नई पीढ़ी इन अंधविश्‍वासों से कुछ दूर दिख रही है लेकिन अभी भी कई छोटे और पिछड़े इलाकों में ये अंधविश्‍वास माने और निभाएं जाते है। भारतीय हिंदू विवाह के 7 वचन इस बात से खासा फर्क नहीं पड़ता है कि आप इन सभी अंधविश्‍वासों को मानते है या नहीं, लेकिन जब यही अंधविश्‍वास जी का जंजाल बन जाते है तो दिक्‍कत होती है। ऐसे ही दस भारतीय 
                             
 अंधविश्‍वासों के बारे में जानिए :
              एक रूपया :-भारतीय संस्‍कृति में एक रूपए का नोट या सिक्‍का काफी खास माना जाता है। किसी भी पावन अवसर पर एक का सिक्‍का लगाकर देना जरूरी होता है। बच्‍चे के जन्‍म से लेकर शादी के समय तक एक रूपए को बड़े नोट जैसे- 50, 100, 500 आदि के साथ लगाकर देने का रिवाज है। भारत में विषम संख्‍या में राशि देने को खराब माना जाता है 
                            
            नींबू मिर्च :-आप भारत के कई घरों में नींबू मिर्च लटकी हुई देख सकते है। सात मिर्चो के साथ एक नींबू को लटकाना अच्‍छा माना जाता है, लोगों का मानना है कि इससे बुरी नजर नहीं लगती है। सात मिर्च इसलिए लटकाई जाती हैं क्‍योंकि सात अंक को जादुई नम्‍बर माना जाता है और लोग मानते है कि ऐसा करने से घर में या व्‍यवसाय में सुख-समृद्धि वापस आ जाती है। 
                           
               काली बिल्‍ली:- भारत में ऐसा माना है कि अगर आप किसी अच्‍छे काम के लिए बाहर जा रहे है और काली बिल्‍ली आपका रास्‍ता काट दे, तो आपका दिन अशुभ होगा और आपका काम बनने की बजाया बिगड़ जाएगा। इसलिए कई लोग काली बिल्‍ली के रास्‍ता काटने पर घर वापस आकर कुछ खा-पीकर जाते है
              दुर्भाग्‍यपूर्ण शनिवार:- भारत में शनिवार को भगवान शनि का दिन माना जाता है और इस दिन को विशेष अवसरों और शुभ कामों के लिए अच्‍छा नहीं मानते है। इस दिन कई काम करना जैसे - लोहा खरीदना, तेल खरीदना आदि भी अशुभ माना जाता है। 
                         
            नज़र लगना:- नज़र लगना, भारत की सबसे बड़ी समस्‍याओं में से एक है। लोग मानते है कि अगर कोई बुरी दृष्टि से देखता है तो नज़र लग जाती है और फिर उसे कई तरीकों से उतारा जाता है। छोटे बच्‍चों, नई दुल्‍हन और नए जोड़े की नज़र खासकर उतारी जाती है ताकि वह बीमार न पड़ें
           पीपल वृक्ष :-भारत के कई हिस्‍सों में माना जाता है कि पीपल में भूतों का वास होता है और आत्‍माएं रहती है जो कि कई लोगों को सच्‍चाई से परे बात लगती है। पीपल का पेड़, रात में भारी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्‍साइड छोड़ता है जिसकी वजह से लोगों को भूतों का वास्‍ता देकर पेड़ से दूर कर दिया जाता है
            नाखून काटना :-भारत में आपके नाखून कितने भी गंदे या बड़े हो गए हों, लेकिन आप उन्‍हे वृहस्‍पति या शनिवार के दिन नहीं काट सकते है। यहां तक कि मंगलवार के दिन भी नाखूनों को काटना गलत माना जाता है। लोग मानते है कि इन दिनों में नाखून काटने से दुर्भाग्‍य आता है। शाम के बाद भी नाखूनों को काटना मना होता है।
                           
            मासिक धर्म से जुड़े मिथक:- भारतीय महिलाएं या लड़कियां, मासिक धर्म के दिनों में अछूत मान ली जाती है। इन दिनों में वह पूजा नहीं कर सकती है और न ही किचेन में प्रवेश कर सकती है। यहां तककि उन्‍हे किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ में शामिल होने की अनुमति भी नहीं होती है।
            चंद्र-ग्रहण प्रभाव :-हर क्षेत्र में भारत में अंधविश्‍वास है ऐसे में ग्रहण क्‍यूं पीछे रह जाएं। भारत में माना जाता है कि ग्रहण के दौरान कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिये, घर के अंदर ही रहना चाहिये और गर्भवती महिला को कतई बाहर नहीं निकलना चाहिये। इस दौरान चाकू से कुछ काटना और खाना खाना भी मना होता है। ग्रहण पड़ने के दौरान सिर्फ पूजा करना उचित माना जाता है। 
             विधवा:- भारत के अंधविश्‍वासी समाज में विधवा को बहुत खराब नज़र से देखा जाता है। पिछड़े इलाकों में आज भी विधवा स्‍त्री को जानवरों से भी बुरी स्थिति में रखा जाता है। उसे सिर्फ सफेद कपड़े पहनने होते है और वह सिर्फ उबला हुआ भोजन कर सकती है।
 
 

और अधिक..........

               आदिम मनुष्य अनेक क्रियाओं और घटनाओं के कारणों को नहीं जान पाता था। वह अज्ञानवश समझता था कि इनके पीछे कोई अदृश्य शक्ति है। वर्षा, बिजली, रोग, भूकंप, वृक्षपात, विपत्ति आदि अज्ञात तथा अज्ञेय देवभूत, प्रेत और पिशाचों के प्रकोप के परिणाम माने जाते थे। ज्ञान का प्रकाश हो जाने पर भी ऐसे विचार विलीन नहीं हुए, प्रत्युत ये अंधविश्वास माने जाने लगे। आदिकाल में मनुष्य का क्रिया क्षेत्र संकुचित था इसलिए अंधविश्वासों की संख्या भी अल्प थी। ज्यों ज्यों मनुष्य की क्रियाओं का विस्तार हुआ त्यों-त्यों अंधविश्वासों का जाल भी फैलता गया और इनके अनेक भेद-प्रभेद हो गए। अंधविश्वास सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। विज्ञान के प्रकाश में भी ये छिपे रहते हैं। अभी तक इनका सर्वथा उच्द्वेद नहीं हुआ है। भारत में अंध विश्वास की जड़े बहुत गहरी हो चुकी हैं, ब्राह्मण साहित्य का इसमें प्रमुख योगदान है ll

अंधविश्वासों का वर्गीकरणसंपादित करें

              अंधविश्वासों का सर्वसम्मत वर्गीकरण संभव नहीं है। इनका नामकरण भी कठिन है। पृथ्वी शेषनाग पर स्थित है, वर्षा, गर्जन और बिजली इंद्र की क्रियाएँ हैं, भूकंप की अधिष्ठात्री एक देवी है, रोगों के कारण प्रेत और पिशाच हैं, इस प्रकार के अंधविश्वासों को प्राग्वैज्ञानिक या धार्मिक अंधविश्वास कहा जा सकता है। अंधविश्वासों का दूसरा बड़ा वर्ग है मंत्र-तंत्र। इस वर्ग के भी अनेक उपभेद हैं। मुख्य भेद हैं रोग निवारण, वशीकरण, उच्चाटन, मारण आदि। विविध उद्देश्यों के पूर्त्यर्थ मंत्र प्रयोग प्राचीन तथा मध्य काल में सर्वत्र प्रचलित था। मंत्र द्वारा रोग निवारण अनेक लोगों का व्यवसाय था। विरोधी और उदासीन व्यक्ति को अपने वश में करना या दूसरों के वश में करवाना मंत्र द्वारा संभव माना जाता था। उच्चाटन और मारण भी मंत्र के विषय थे। मंत्र का व्यवसाय करने वाले दो प्रकार के होते थे-मंत्र में विश्वास करने वाले और दूसरों को ठगने के लिए मंत्र प्रयोग करने वाले।

जादू, टोनासंपादित करें

            जादू-टोना, शकुन, मुहूर्त, मणि, ताबीज आदि अंधविश्वास की संतति हैं। इन सबके अंतस्तल में कुछ धार्मिक भाव हैं, परंतु इन भावों का विश्लेषण नहीं हो सकता। इनमें तर्कशून्य विश्वास है। मध्य युग में यह विश्वास प्रचलित था कि ऐसा कोई काम नहीं है जो मंत्र द्वारा सिद्ध न हो सकता हो। असफलताएँ अपवाद मानी जाती थीं। इसलिए कृषि रक्षा, दुर्गरक्षा, रोग निवारण, संततिलाभ, शत्रु विनाश, आयु वृद्धि आदि के हेतु मंत्र प्रयोग, जादू-टोना, मुहूर्त और मणि का भी प्रयोग प्रचलित था।
         मणि धातु, काष्ठ या पत्ते की बनाई जाती है और उस पर कोई मंत्र लिखकर गले या भुजा पर बाँधी जाती है। इसको मंत्र से सिद्ध किया जाता है और कभी-कभी इसका देवता की भाँति आवाहन किया जाता है। इसका उद्देश्य है आत्मरक्षा और अनिष्ट निवारण।
          योगिनी, शाकिनी और डाकिनी संबंधी विश्वास भी मंत्र विश्वास का ही विस्तार है। डाकिनी के विषय में इंग्लैंड और यूरोप में 17वीं शताब्दी तक कानून बने हुए थे। योगिनी भूतयोनि में मानी जाती है। ऐसा विश्वास है कि इसको मंत्र द्वारा वश में किया जा सकता है। फिर मंत्र पुरुष इससे अनेक दुष्कर और विचित्र कार्य करवा सकता है। यही विश्वास प्रेत के विषय में प्रचलित है।
           फलित ज्योतिष का आधार गणित भी है। इसलिए यह सर्वांशतः अंधविश्वास नहीं है। शकुन का अंधविश्वास में समावेश हो सकता है। अनेक अंधविश्वासों ने रूढ़ियों का भी रूप धारण कर लिया है।
            

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अंधविश्‍वासी समाज

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