Saturday, December 1, 2018


मेवाड़ राजवंश का संक्षिप्त इतिहास


मेवाड़ राजवंश का संक्षिप्त इतिहास

Posted on Jun 24, 2016


वीर प्रसूता मेवाड की धरती राजपूती प्रतिष्ठा, मर्यादा एवं गौरव का प्रतीक तथा सम्बल है। राजस्थान के दक्षिणी पूर्वी अंचल का यह राज्य अधिकांशतः अरावली की अभेद्य पर्वत श्रृंखला से परिवेष्टिता है। उपत्यकाओं के परकोटे सामरिक दृष्टिकोण के अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है। >मेवाड अपनी समृद्धि, परम्परा, अधभूत शौर्य एवं अनूठी कलात्मक अनुदानों के कारण संसार के परिदृश्य में देदीप्यमान है। स्वाधिनता एवं भारतीय संस्कृति की अभिरक्षा के लिए इस वंश ने जो अनुपम त्याग और अपूर्व बलिदान दिये सदा स्मरण किये जाते रहेंगे। मेवाड की वीर प्रसूता धरती में रावल बप्पा, महाराणा सांगा, महाराण प्रताप जैसे सूरवीर, यशस्वी, कर्मठ, राष्ट्रभक्त व स्वतंत्रता प्रेमी विभूतियों ने जन्म लेकर न केवल मेवाड वरन संपूर्ण भारत को गौरान्वित किया है। स्वतन्त्रता की अखल जगाने वाले प्रताप आज भी जन-जन के हृदय में बसे हुये, सभी स्वाभिमानियों के प्रेरक बने हुए है। मेवाड का गुहिल वंश संसार के प्राचीनतम राज वंशों में माना जाता है। मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं




 मेवाड में गहलोत राजवंश – बप्पा ने सन 734 ई० में चित्रांगद गोरी परमार से चित्तौड की सत्ता छीन कर मेवाड में गहलौत वंश के शासक का

सूत्रधार बनने का गौरव प्राप्त किया। इनका काल सन 734 ई० से 753 ई० तक था। इसके बाद के शासकों के नाम और समय काल निम्न था –
रावल बप्पा ( काल भोज ) – 734 ई० मेवाड राज्य के गहलौत शासन के सूत्रधार।
रावल खुमान – 753 ई०
मत्तट – 773 – 793 ई०
भर्तभट्त – 793 – 813 ई०
रावल सिंह – 813 – 828 ई०
खुमाण सिंह – 828 – 853 ई०
महायक – 853 – 878 ई०
खुमाण तृतीय – 878 – 903 ई०
भर्तभट्ट द्वितीय – 903 – 951 ई०
अल्लट – 951 – 971 ई०
नरवाहन – 971 – 973 ई०
शालिवाहन – 973 – 977 ई०
शक्ति कुमार – 977 – 993 ई०
अम्बा प्रसाद – 993 – 1007 ई०
शुची वरमा – 1007- 1021 ई०
नर वर्मा – 1021 – 1035 ई०
कीर्ति वर्मा – 1035 – 1051 ई०
योगराज – 1051 – 1068 ई०
वैरठ – 1068 – 1088 ई०
हंस पाल – 1088 – 1103 ई०
वैरी सिंह – 1103 – 1107 ई०
विजय सिंह – 1107 – 1127 ई०
अरि सिंह – 1127 – 1138 ई०
चौड सिंह – 1138 – 1148 ई०
विक्रम सिंह – 1148 – 1158 ई०
रण सिंह ( कर्ण सिंह ) – 1158 – 1168 ई०
क्षेम सिंह – 1168 – 1172 ई०
सामंत सिंह – 1172 – 1179 ई०
(क्षेम सिंह के दो पुत्र सामंत और कुमार सिंह। ज्येष्ठ पुत्र सामंत मेवाड की गद्दी पर सात वर्ष रहे क्योंकि जालौर के कीतू चौहान मेवाड पर अधिकार कर लिया। सामंत सिंह अहाड की पहाडियों पर चले गये। इन्होने बडौदे पर आक्रमण कर वहां का राज्य हस्तगत कर लिया। लेकिन इसी समय इनके भाई कुमार सिंह पुनः मेवाड पर अधिकार कर लिया। )

कुमार सिंह – 1179 – 1191 ई०
मंथन सिंह – 1191 – 1211 ई०
पद्म सिंह – 1211 – 1213 ई०
जैत्र सिंह – 1213 – 1261 ई०
तेज सिंह -1261 – 1273 ई०
समर सिंह – 1273 – 1301 ई०
(समर सिंह का एक पुत्र रतन सिंह मेवाड राज्य का उत्तराधिकारी हुआ और दूसरा पुत्र कुम्भकरण नेपाल चला गया। नेपाल के राज वंश के शासक कुम्भकरण के ही वंशज हैं। )

35. रतन सिंह ( 1301-1303 ई० ) – इनके कार्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौडगढ पर अधिकार कर लिया। प्रथम जौहर पदमिनी रानी ने सैकडों महिलाओं के साथ किया। गोरा – बादल का प्रतिरोध और युद्ध भी प्रसिद्ध रहा।
36. अजय सिंह ( 1303 – 1326 ई० ) – हमीर राज्य के उत्तराधिकारी थे किन्तु अवयस्क थे। इसलिए अजय सिंह गद्दी पर बैठे।
37. महाराणा हमीर सिंह ( 1326 – 1364 ई० ) – हमीर ने अपनी शौर्य, पराक्रम एवं कूटनीति से मेवाड राज्य को तुगलक से छीन कर उसकी खोई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की और अपना नाम अमर किया महाराणा की उपाधि धारण की । इसी समय से ही मेवाड नरेश महाराणा उपाधि धारण करते आ रहे हैं।
38. महाराणा क्षेत्र सिंह ( 1364 – 1382 ई० )
39. महाराणा लाखासिंह ( 1382 – 11421 ई० ) – योग्य शासक तथा राज्य के विस्तार करने में अहम योगदान। इनके पक्ष में ज्येष्ठ पुत्र चुडा ने विवाह न करने की भीष्म प्रतिज्ञा की और पिता से हुई संतान मोकल को राज्य का उत्तराधिकारी मानकर जीवन भर उसकी रक्षा की।
40. महाराणा मोकल ( 1421 – 1433 ई० )
41. महाराणा कुम्भा ( 1433 – 1469 ई० ) – इन्होने न केवल अपने राज्य का विस्तार किया बल्कि योग्य प्रशासक, सहिष्णु, किलों और मन्दिरों के निर्माण के रुप में ही जाने जाते हैं। कुम्भलगढ़ इन्ही की देन है. इनके पुत्र उदा ने इनकी हत्या करके मेवाड के गद्दी पर अधिकार जमा ल

एक अशुद्ध बेवकूफ.......

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व्यंग्य
एक अशुद्ध बेवकूफ


बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।
मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा मजा है- मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है- करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं- चिढ़ जायें या शुद्ध बेवकूफ बन जायें। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूं।
अभी जो साहब आये थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आये। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं- तुलसीदास, सूरदास, गालिब, अनीस वगैरह। पर मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं, इसलिए काव्य-चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आये।
मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आमतौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनायी, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आये ही नहीं थे- वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है।
मैंने कहा- कुछ सुनाइए।
वे बोले- मैं आपसे कुछ लेने आया हूं।
मैंने समझा ये शायद ज्ञान लेने आये हैं।
मैंने सोचा- यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा।
पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे- हम तो आपसे कुछ लेने आये हैं।
मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आये हैं।
कविताएं उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए।
उठने लगे तो बोले- डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा।
मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मन्त्री से कह दूंगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं।
एक घण्टे जानकर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना- मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आये। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बर्ताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है।
डीन मेरे यार हैं। कहने लगे- यार चलो केण्टीन में, अच्छी चाय पी जाय। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाय।
अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके।
हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गये कि मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूं। आज यह लालसा पूर्ण हुई।(हालांकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।)
अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है- 'टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट'- याने थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली।
शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आये। कहने लगे- डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कांपियां भी- और 'माडरेशन' के लिए बुला लें तो और अच्छा है।
मैंने कहा- मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूंगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी।
बेचारे क्या जवाब देते? अशुद्ध बेवकूफ मैं- मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है।
एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गये। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आये हैं। वे पसीना पोंछकर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूं। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूं। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है।
घण्टे-भर राजनीतिक बातें हुईं।
वे उठे तो कहने लगे- मुझे जरा दस रुपये दे दीजिए।
मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपये में निपट गई।
एक दिन एक नीति वाले भी आ गये। बड़े तैश में थे।
कहने लगे- हद हो गयी! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए।
मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूं न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा।
वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए।
मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उल्टा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं।
वे बोले- याने बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है?
मैंने कहा- आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सुअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाईये कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएं।
वे बोले- बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुम्बा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सिलेक्शन हो जाएगा।
मैंने कहा- कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कालरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं।
वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गयी।
मैंने कहा- आप जाइए। निश्चिंत रहिए- लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूं करूंगा।
वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बनने-वाले 'अशुद्ध' बेवकूफ के अलग मजे हैं।
मुझे याद आया गुरु कबीर ने कहा था- 'माया महा ठगनि हम जानी'।

Sunday, November 18, 2018

हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा ठग

हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा ठग, जिसने बेचा ताजमहल, लाल किला और राष्ट्रपति भवन

Tejaram dewasi,August 24, 2017 5:12 pm

हिन्दुस्तान के इतिहास में एक ठग ऐसा हुआ जिसके किस्सें आज भी लोगों जुबान पर है। नटवर लाल के नाम से मशहूर यह ठग कोई छोटा-मोटा ठग नहीं था। इसने ऐसी-ऐसी ठगी की जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते है। नटवर लाल में लोगों को ठगने की अनोखी कला थी। लोग उसके बात करने के तरीके और आत्म विश्वास से प्रभावित होकर ठगी का शिकार बन जाते थे। नटरवर लाल ने तीन बार आगरा का ताजमहल, दो बार लाल किला और एक बार राष्ट्रपति भवन बेच दिया था। नटवर लाल का असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था। बताया जाता है कि मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव ने अपने जीवन काल में पुलिस से बचने के लिये 56 नाम रखे, लेकिन लोग उनको नटवर लाल के नाम से ज्यादा जानते थे। मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव के ठगी के कई किस्सें है, लेकिन इससे पहले हम आपको मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल के निजी जीवन के बारे में बताते है।

मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल का जीवन परिचय


मिथिलेश कुमार श्री वास्तव का जन्म बिहार के सीवान जिले में जीरादेई गांव में हुआ था। मिथिलेश कुमार की पत्नी की मृत्यु शादी के कुछ सालों बाद ही हो गई थी। उसके कोई संतान भी नहीं थी। बताया जाता है कि मिथिलेशकुमार ने वकालत कर रखी थी। वह थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी बोल लेता था। कुछ समय के लिये उसने पटवारी की नौकरी भी की थी। लेकिन उसका मन वकालत और पटवारी की नौकरी में नहीं लगा। उसका दिमाग तो हेराफेरी, चार सौ बीसी, ठगी में ज्यादा चलता था। अपने जीवन काल में उसने ठगी की कई वारदातें की थी। जिनके चर्चे आज भी होते है।


नकली साइन करने में था माहिर


नटवर लाल में एक कला थी। वो किसी के भी हुबहू साइन कर लेता था। बताया जाता है कि एक बार नटवर लाल के गांव में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आये थे। वहां नटवर लाल ने अपनी कला का नमूना पेश करते हुये डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सामने उनके हुबहू हस्ताक्षर कर सबको चौंका दिया।अपनी इसी कला का फायदा उठाते हुये उसने पहली ठगी पडौसी के साथ की थी। उसने अपने पडौसी के चेक पर नकली साइन कर 1000 रूपये निकाल लिये। यहीं से उसने ठगी की दुनिया में कदम रख दिया। इसके बाद उसने एक से बढकर एक ठगी की वारदातों को अंजाम दिया।

ताजमहल, लाल किला और राष्ट्रपति भवन को बेचा


नटवर लाल की ठगी की कहानियों में सबसे ज्यादा मशहूर तीन बार ताजमहल, दो बार लाल किला और एक बार राष्ट्रपति भवन बेचना रहा। बताया जाता कि नटवर लाल  ने  राष्ट्रपति के नकली हस्ताक्षर कर इन इमारतों को बेच दिया था। नटवर लाल ने सरकार को ही नहीं बल्कि कई उद्योगपतियों को भी ठगा था। उसने सबसे ज्यादा सरकारी कर्मचारी और मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों को निशाना बनाया था। नटवर लाल की अंग्रेजी भाषा पर पकड़ थोडी कमजोर थी नही तो वो विदेशों में भी कई वारदातों को अंजाम देता और विदेशों में भी उसके किस्सें सुनाये जाते। नटवर लाल पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में ठगी के 100 से ज्यादा मामले दर्ज थे। इन राज्यों की पुलिस ने मिथिलेश पर ईनाम घोषित कर रखा था।  अपने जीवनकाल में नटवर लाल 9 बार पकड़ा गया था, और सिर्फ 11 साल ही जेल में रहा। ठगी के 30 मामलों में तो उसे सजा ही नहीं मिल पाई थी।

पुलिस को चकमा देने में भी था माहिर


नटवर लाल जिस शातिराना अंदाज से ठगी करता था, उसी शातिराना अंदाज में पुलिस को चकमा देकर भागने में माहिर था। नटवर लाल कई बार पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहा था। एक बार ठगी के एक मामले में नटवर लाल को दिल्ली की तिहाड जेल से कानपुर पेशी पर ले जाया जा रहा था। इस दौरान उसके साथ उत्तर प्रदेश पुलिस के दो सिपाही और एक हवलदार थे। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ थी। नटवर लाल की उम्र उस वक्त 75 साल थी। वह बैंच पर बैठा-बैठा हाफ रहा था। उसने यूपी पुलिस के जवान से कहा कि बेटा मेरा शरीर हाफ रहा है,  बाहर से दवाई लाकर मुझे दे दो, जब मेरे रिश्तेदार मिलने के लिये आयेंगे तो तुम्हारे पैसे वापस दे दूंगा। इसके बाद जवान दवाई लेने के लिये चला गया। नटवर लाल के पास अब दो पुलिस वाले बचे थे। इनमें से एक पुलिस वाले को नटवर लाल ने पानी लेने के लिये भेज दिया। अब सिर्फ हवलदार बचा था। हवलदार को नटवर लाल ने कहा कि बेटा मुझे बाथरूम जाना है। यहां भीड़ ज्यादा है और मुझे चलने में परेशानी हो रही है। तुम रस्सी पकडे मेरे साथ चलोगे तो लोग मुझे रास्ता दे देंगे। इसके बाद मिथिलेश उर्फ नटवर लाल ने भीड़ का फायदा उठाते हुये कब रस्सी खोली और कब गायब हो गया पता ही नहीं चला। नटवर लाल के फरार होने के बाद तीनों पुलिस वालों को निलंबित कर दिया गया। इससे पहले भी नटवर लाल पुलिस को गच्चा देकर भागने में सफल रहा था।



खुद को मानता था रॉबिन हुड


नटवर लाल अपने आप को गरीबों का मसीहा बताता था। वह कहता था कि मेरे द्वारा ठगी किये गये रूपयों को मैं गरीबों और जरूरतमंद लोगों को बांट देता हूं। नटवर लाल को अपने किये पर कोई मलाल नहीं था। वह अपने आप को रॉबिन हुड समझता था। वह कहता था कि मैंने कभी हथियार या मार पिटाई का सहारा नहीं लिया। लोगों से बहाने बनाकर रूपयें मांगे, और लोगों ने दिये। इसमें मेरा क्या कसूर है। नटवर लाल में इतना आत्मविश्वास था कि एक बार उसने कोर्ट में जज से कहा कि जज साहब मेरे बात करने का तरीका ही अनोखा है अगर आप मुझसे 10 मिनट बात कर लेंगे तो आप वहीं फैसला सुनाऐंगे जो मैं कहूंगा। 

अन्तिम बार कहां देखा गया


 नटवर लालनटवर लाल भारत के अलग-अलग जगहों पर अपनी पहचान छुपाकर फरारी काटता थ अन्तिम बार उसे बिहार के दरभंगा रेलवे स्टेशन पर देखा गया था। जहां एक पुलिस वाले ने उसे पहचान लिया था। वह पुलिस वाला उसे बचपन से जानता था नटवर लाल भी समझ गया था कि उसे पहचान लिया गया है। जब तक पुलिस वाले उसके पास पहुंचते तब तक वह फरार हो चुका था। बताया जाता है पास ही खडी मालगाड़ी के डिब्बे में नटवर लाल के कपडे मिले और गार्ड की यूनीफॉर्म गायब थी। इसके बाद 2004 में नटवर लाल का नाम सामने आया। तब एक वकील ने कहा था कि नटवर लाल ने अपनी वसीयतनुमा फाइल उसे सौंपी है। कुछ लोगों का कहना है कि नटवर लाल की मृत्यु 2009 में हुई है, जबकि उसके पारिवारिक रिश्तेदार दावा करते रहे है कि नटवर लाल 1996 में ही मर चुका है। नटवर लाल की मृत्यु को लेकर कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिले है। ऐसे में इतिहास के इस सबसे बडे ठग ने अपनी मौत से भी लोगों को धोखा दिया।



मिथिलेश कुमार का नटवर लाल नाम आज इतना मशहूर हो चुका है कि अगर कोई ठगी की कोशिश या मजाक भी करे तो लोग उसे नटवर लाल के नाम से सम्बोधित कर देते है। नटवर लाल का नाम आज मुहावरे के रूप में सम्बोधित होने लगा है।


Saturday, September 1, 2018

आचार्य सम्राट श्री विजय शांति सुरीश्वरजी गुरुदेव 'मंडोली वाले



आचार्य सम्राट श्री विजय शांति सुरीश्वरजी गुरुदेव 'मंडोली वाले'

शांति सुरेश्वरजी

'असाधारण अक्सर सामान्य के वस्त्रों में छिपा हुआ होता है' और भाग्यशाली वे लोग हैं जो अपनी सरल उपस्थिति के पीछे महानता को समझ सकते हैं क्योंकि वे ऐसे हैं जिन पर ऐसी महान आत्माओं की कृपा होती है। हमारी विशाल आंखों से महान पुरुषों के बारे में क्या देखा जा सकता है, केवल हिमशैल की नोक है, इसलिए उनके द्वारा किए जा रहे सामान्य कार्यों को देखने के बाद उनके बारे में कोई राय नहीं है, यह हमारा सबसे बड़ा भ्रम है।
पिता श्री तोलाजी भीम और माता श्रीमती वासुदेवी, अहिर (देवासी)की कोख से सन् 18 9 2 में जन्में धन्य बच्चे को सोगोजी नाम दिया गया था। उनका जन्म स्थान मरुधरा प्रदेश के सिरोही जिले के गांव मनादार था। आठ वर्ष की आयु में, उनकी दिव्यता को उनके गुरुदेव श्री तीर्थ विजय जीमहरराज द्वारा मान्यता मिली और उन्होंने बच्चे को उनके साथ ले लिया, इस प्रकार उन्होंने अपनी सर्वोच्च यात्रा की शुरुआत की।
जैसा कि सोगोगोगी सोलह हो गया, उसने जैन साधु के तप संप्रदाय के तहत सैंथुद की शुरुआत की और तब से उन्हें श्री शांति विजय जी के नाम से जाना जाता था। दीक्षा के तुरंत बाद, अपने गुरु से दिशा प्राप्त करने के बाद, वह आबू के डरावने जंगलों में गया था, जहां वह गहरी ध्यान में गया और पूर्ण चुप्पी देखकर गंभीर तपस्या का अभ्यास किया। अक्सर शेर, चीता, लोमड़ी, आदि उनके पास बैठे पाए जाते थे, ऐसा महसूस किया गया था कि उनकी विशाल शांति ने ऐसे जंगली जानवरों की फारल प्रवृत्तियों को भी शांत कर दिया था।
इस अवधि के दौरान उन्हें दादा गुरुदेव श्री धर्म विजय जी के दिव्य मार्गदर्शन प्राप्त हुए और उनके आशीर्वाद के साथ उनका मार्ग प्रबुद्ध हो गया। ज्ञान की देवी 'सरस्वती देवी' उनके लिए 'सिद्ध' थीं और उनकी कृपा से वह सभी पवित्र शास्त्रों को पढ़ सकते थे और कई भाषाओं में बात कर सकते थे, भले ही वह कभी स्कूल नहीं गए।
उनके आशीर्वाद के साथ जैन तीर्थ 'केसरीयाजी' का विवाद हल हो गया था। कई धर्मों के लोगों ने दावा किया कि उनकी तीर्थ होने के बावजूद, गुरुदेव ने अपने सपने में मेवार राजा भोपाल सिंह को दिव्य दिशा दी, जिन्होंने फिर राजपत्र में एक परिपत्र पारित किया कि यह संकेत केवल जैन से संबंधित था। जैन और ब्राह्मण के बीच संघर्ष को हल करने के लिए, गुरुदेव को मेवार जाना पड़ा, हालांकि उनकी प्रविष्टि तब तक मंत्री श्री सुखदेव प्रसाद जी द्वारा दी गई थी, जो उस समय और स्थान पर दी गई गंतव्य में दिव्य ऊर्जा का उपयोग करते थे। अलौकिक शक्तियों के असाधारण प्रदर्शन को देखते हुए सभी डंबफॉल्ड अधिकारियों और पुलिस ने उनके सामने झुकाया। इस चमत्कार को देखते हुए उन्हें 'युग प्रधान' के थेहोनोर के साथ सम्मानित किया गया।
उनका संदेश 'यूनिवर्सल लव' है, उन्होंने कहा कि हर धर्म का क्रूक्स बिना शर्त प्यार करना है। यह संदेश विभिन्न धर्मों और देशों के लोगों द्वारा अच्छी तरह से प्राप्त हुआ था जो उनके अनुयायी बन गए। गुरुदेव जानवरों और पर्यावरण के लिए गहरी करुणा थी। अपने भाषणों को सुनकर कई साम्राज्यों ने पशु बलिदान पर प्रतिबंध लगा दिया और हजारों लोगों ने शपथ ग्रहण से मुक्त जीवन जीने के लिए शपथ ली। अपनी शिक्षाओं में गुरुदेव ने लोगों को हर दिन एक घंटे के लिए मौन का निरीक्षण करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लोगों को इसके बारे में पूरी समझ हासिल करने के बाद अपने अनुष्ठानों और धार्मिक प्रथाओं को करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा, 'सही समझ ज्ञान और पूर्ण ज्ञान की ओर ले जाती है ज्ञान'।
गुरुदेव ने 1 9 45 में पचास वर्ष की आयु में समाधि ली। उनके निर्देशों के बाद, उनके शरीर मंडोली नगर में संस्कार किया गया, जो अब एक प्रसिद्ध तीर्थयात्रा है।
जो भी अपने दिल में विश्वास के साथ अपने दरवाजे पर जाता है, उसके दुखों को हटा दिया जाता है, उसकी समस्याएं हल हो जाती हैं और उन्हें आज भी सही धारणा और ज्ञान से आशीर्वाद मिलता है। दुनिया भर से उनके भक्त हर साल मंडोली नगर में उनके मंदिर में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी दिव्य देखभाल और प्यार प्राप्त करते हैं।
पूज्यिरतगुरुजी को प्रचुर मात्रा में ज्ञान, सिद्धि और ज्ञान से ज्ञान प्राप्त हुआ और वह पूरे चरममंगल परिवार के प्रिय दादा गुरुदेव हैं, जो लगातार उनकी रक्षा, आशीर्वाद और उनकी देखभाल करते हैं।

अधिक जानकारी के लिए http://incrediblenewindia.blogspot.com/2018/09/18-9-2-1-9-45-httpsincrediblenewindia.html?spref=bl

अगर भारत में पैदा होते तो स्टीफन हॉकिंग तो करते ये सारे काम...

अगर भारत में पैदा होते तो स्टीफन हॉकिंग करते ये सारे काम...




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मशहूर वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने 76 साल की उम्र में बुधवार को दुनिया से विदा ली.
वो एक ऐसी बीमारी से पीड़ित थे, जिसके चलते उनके शरीर के कई हिस्सों पर लकवा मार गया था. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और विज्ञान के क्षेत्र में नई खोज जारी रखी.
बिग बैंग थ्योरी, सापेक्षता (रिलेटिविटी) और ब्लैक होल को समझने में हॉकिंग की अहम भूमिका थी.
स्टीफ़न का जन्म 8 जनवरी 1942 को इंग्लैंड के ऑक्सफ़ोर्ड में हुआ था. स्टीफ़न की खोज पूरी दुनिया के काम आई.
स्टीफ़न हॉकिंग के निधन के बाद हमने बीबीसी हिंदी के पाठकों से सवालकिया,



स्टीफन हॉकिंग

इस सवाल के हमें कई दिलचस्प जवाब मिले. हम आपको यहां कुछ चुनिंदा कमेंट्स पढ़वा रहे हैं.
अगर भारत में पैदा हुए होते स्टीफ़न तो...
बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पेज पर माधव श्रीमोहन ने कमेंट किया, ''अब तक स्टीफ़न हॉकिंग की घरवापसी हो चुकी होती. वो सीतारमण हरेकृष्ण बन चुके होते. ज़िंदगीभर गाय और गोमूत्र में उलझे रहते.''
मोहम्मद रिज़वान ख़ान लिखते हैं, ''अगर भारत में पैदा हुए होते तो बचपन में दिमाग में कोहिनूर भर दिया जाता और वो पकौड़े बेच रहे होते.''
शुभम सिंह लिखते हैं, '' वैज्ञानिक किसी एक देश का नहीं होता है. वो पूरी दुनिया का होता है. भारत ने भी पूरी दुनिया को बहुत से वैज्ञानिक दिए हैं.''
तरन्नुम अफरोज ने लिखा, ''काबिलियत किसी देश की मोहताज नहीं होती. स्टीफ़न भारत के होते तब भी नाम कमाते.''



स्टीफन हॉकिंग

ऋषि लिखते हैं, ''भारत में पैदा होने पर हॉकिंग अब्दुल कलाम जैसे आदमी होते और देश को कामयाबी की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते.
अंशुल शर्मा ने लिखा, ''भारत में पैदा हुए होते स्टीफन तो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में राम मंदिर बनता. अपने घर को भगवा पोतते.''
गोवर्धन लिखते हैं, ''वे भारत में पैदा हुए होते तो ब्रह्मसूत्र और वेद पढ़ते और सृष्टि निर्माण का सटीक कारण और प्रक्रिया जान ही लेते.''
कश्मीरा नाम के यूजर ने लिखा, ''सरकार की तरफ से उनको सर्वश्रेष्ठ सम्मान की जगह समाज कल्याण विभाग द्वारा व्हील चेयर उपलब्ध करवाई जाती.''
संदीप लिखते हैं, ''धार्मिक कर्मकांडों में पड़ जाते और कुछ ना कर पाते.''
अखिलेश प्रताप सिंह ने लिखा, ''भारत में पैदा हुए होते तो स्टीफन हॉकिंग देशद्रोही करार दिए जाते.'' कुमार कृष्णा ने लिखा- अयोध्या मंदिर का डिजाइन बना रहे होते.''
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